शुक्रवार, 2 सितंबर 2016

कोई भक्त परमात्मा के प्रति पूर्णरूप से समर्पित हो जाता है

कोई भक्त परमात्मा के प्रति पूर्णरूप से समर्पित हो जाता है
तो फिर उसके पास कोई तर्क नहीं रहता। इसके बाद उसके मन में किसी प्रकार की भावना नहीं आती। इससे यह भी सिद्ध होता है कि संसार का प्रत्येक कण परमात्मा के इशारे पर चलता है। यह अलग बात है कि परमात्मा को कभी हम वृक्ष के रूप में देखते हैं तो कभी पहाड़ के रूप में। कभी मनुष्य के रूप में देखते हैं तो कभी पशु-पक्षी के रूप में। इस प्रकार हमारे देखने की विधि हर जगह अलग-अलग होती है, लेकिन उस परमात्म-तत्व में कोई अंतर नहीं आता है।


रसायन शास्त्र के अनुसार पूरा ब्रह्मांड एक है। हिमालय के पहाड़ हों या घास का कोई मैदान, इन सबमें कोई अंतर नहीं होता। हम अध्यात्म की प्रयोगशाला में इन तमाम वस्तुओं को रखते हैं तो स्पष्ट हो जाता है कि विज्ञान यहां नहीं पहुंच रहा है। इस संसार का एक-एक कण, उसी परमात्म शक्ति से संचालित हो रहा है।वैज्ञानिकों का मानना है कि यह ब्रrांड अद्भुत है। इसमें करोड़ों आकाश गंगाएं हैं। हमारे सौरमंडल से भी बड़े ग्रह हैं। ब्लैक होल्स हैं, जिनमें बड़े से बड़े ग्रह समा जाते हैं। खगोल शास्त्रियों का कहना है कि इस असीमित ब्रrांड में एक ऐसी अदृश्य शक्ति है, जो इसका संचालन कर रही है। महानतम वैज्ञानिक अल्बर्ट आइंस्टीन भी इस तथ्य को मानते थे कि ऐसा लगता है कि कोई अदृश्य शक्ति इस अद्भुत ब्रrांड को संचालित कर रही है। मनुष्य कहता है कि मेरे पास पांच ज्ञान इंद्रियां, पांच कर्म इंद्रियां और एक मन है। कुल मिलाकर ग्यारह हुए। जिनके पास ये सारे के सारे हो जाएं, वह अपने चारों ओर एक लकीर खींचकर खड़ा हो जाता है कि हम मनुष्य हैं। पशु-पक्षियों की तुलना में हम बड़े ही सभ्य, विचारवान व गहरी समझ वाले हैं। लेकिन क्या आप जानते हैं कि पशु-पक्षियों के पास भी इंद्रियां होती हैं। विज्ञान भी मानता है कि मनुष्य, वनस्पतियों और कुदरत पर ब्रrांड के ग्रहों का प्रभाव पड़ता है। यदि हम सूर्य से प्रभावित होते हैं तो सूर्य भी हमसे अवश्य प्रभावित होता रहता है। यह बहुत गहरा विज्ञान है। दरअसल विज्ञान और अध्यात्म का एक ही अंतिम लक्ष्य है। वह है सत्य का खुलासा करना। फर्क सिर्फ यही है कि विज्ञान जहां भौतिक पदार्र्थो का अध्ययन करता है वहींअध्यात्म चेतना का विज्ञान है। आप अदृश्य शक्ति को परमात्मा कहें, गॉड कहें या कोई भी नाम दें, लेकिन वही शक्ति कुदरत को और हम सभी को संचालित कर रही है।

गुरुवार, 1 सितंबर 2016

संत रामपाल जी महाराज के अनुयायियों की जमानत मंजूर

सतलोक आश्रम बरवाला प्रकरणः में लगातार हो रही संत रामपाल जी महाराज के भक्तों की जमानत से भक्तों की उम्मीदें अब अपने गुरु जी के बाहर आने की और लगी हुई है, सतलोक आश्रम बरवाला की घटना के दौरान संत रामपाल जी महाराज सहित 1000 के करीब अनुयायियों पर विभिन्न धाराओं के तहत झूठे केसों का पुलिंदा बनाया गया था। अभी भी 112 अनुयायी उन झूठे केसों के कारण जेल में हैं, जिनमें से आज 26 अनुयायियों की जमानत पंजाब & हरियाणा हाइकोर्ट में लगायी गयी, जिनमे से इन लोगों की जमानत मंजूर कर ली गयी


     संत रामपाल जी महाराज के अनुयायी अब अपने गुरु जी के बाहर आने का इंतजार बेसब्री से कर रहे हैं। साथ ही उनका कहना है की यदि सरकार CBI जाँच करवाती तो उन्हें इतना लंबा इंतजार नही करना पड़ता। न्यायालय के प्रति आस्था जताते हुए उन्होंने कहा की नेक और ईमानदार जजो से न्याय की उम्मीद अभी भी कायम है।


सद्गुरु देव जी की जय हो
आप सभी भगतो से प्रार्थना है कि पवन जयपुर,संजय दिल्ली और इनका साथ देने वाले सभी व्यक्ति जो अपने आप को सत सेवक कहते हैं वास्तव में ये लोग मालिक के मिशन को फेल करने के लिए एक षड्यंत्र के तहत आर्य समाजियों से मिले हुए हैं। और भगतो को भ्रमित कर रहे हैं।  ये अपने आप को सत सेवक कहने वाले गुरूजी को परमात्मा तो दूर गुरूजी भी नही मानते और गुरूजी को असहाय साबित करना चाहते हैं।

""भगतो ये खुद को सत सेवक कहने वाले काल के दूत कहते है कि हिसार तारीखों पर नही जाना है।क्योंकि  संगत  हिसार तारीखों पर जाती है इसलिए प्रसाशन गुरूजी को कोर्ट में नही पेश करता और जब तक गुरूजी को प्रशाशन कोर्ट में पेश नही करेगा तब तक गुरूजी जेल से बाहर नही आ सकते।""
👆🏽👆🏽ये कहना है इन काल के दूत सत सेवकों का

लगता है इन सत सेवको की अक्ल घास चरने गयी है क्योंकि......
गुरूजी स्वयं परमात्मा हैं और परमात्मा जी जो चाहे सो कर सकते हैं।बस हमको परमात्मा में विश्वाश होना जरूरी है। पर इन सत सेवको की बुद्धि भ्रष्ट हो गयी है ।

यदि गुरूजी के दर्शनों के लिए और तारीखों पर हिसार जाने की मनाही होती तो गुरूजी ने स्वयं भगतो को कोर्ट के अंदर आशीर्वाद दिया था जिसका वीडियो भी आपजी भगतो के पास उपलब्ध है और यदि मनाही ही होती तो गुरूजी वकील के माध्यम से या कोर्ट में गुरूजी के द्वारा आशीर्वाद देते वक्त ही गुरूजी स्वयं भगतो को मना कर देते की बच्चों तारीखों पर ना आया करो।
पर गुरुजी ने स्वयं अपने बच्चों को कोर्ट के अंदर बड़े प्यार से आशीर्वाद दिया था।
इससे स्प्स्ट होता है कि हिसार तारीखों पर गुरूजी के दर्शनों के लिए जाने के गुरुजियों के ही आदेश हैं भगतो। और गुरूजी ने हमे इतना ज्ञान तो दिया ही है कि हमे अपने गुरूजी के दर्शनों के लिए जरूर जाना चाहिए जी। वो हमारे पिता हैं और पिताजी से मिलने जाने से रोकने वाले कौन हैं आप स्वयं अंदाज लगा सकते हो जी।

गुरूजी कहते हैं कि
गुरु दर्श को जाइये दिन में कई कई बार ।
और असोज के मेघ ज्यो घना करे उपकार।।

इसलिए भगतो सर्व संगत से प्रार्थना है कि इन अपने आप को सत सेवक कहने वाले काल के सेवको पवन संजय और इनका साथ देने वाले व्यक्तियो से सावधान रहे और अपनी भगति,सेवा,सुमिरन करते रहे और गुरूजी द्वारा बताए अनुसार दान भी करते रहे जी। किसी भी प्रकार की दान सेवा करने के लिये एक मात्र अपने जिला,सम्भाग या स्टेट कॉर्डिनेटर सिस्टम से ही सम्पर्क करे जी जो की गुरूजी के द्वारा बनाये गए हैं ।

🍃पिंजरे का तोता🍃

                        सत साहेब

एक समय की बात हैं, एक सेठ और सेठानी रोज सत्संग में जाते थे।
सेठजी के एक घर एक पिंजरे में तोता पाला हुआ था।

तोता रोज सेठ-सेठानी को बाहर जाते देख एक दिन पूछता हैं कि सेठजी आप रोज कहाँ जाते है।

सेठजी बोले कि भाई सत्संग में ज्ञान सुनने जाते है। तोता कहता है सेठजी फिर तो कोई ज्ञान की बात मुझे भी बताओ। तब सेठजी कहते हैं की ज्ञान भी कोई घर बैठे मिलता हैं। इसके लिए तो सत्संग में जाना पड़ता हैं।

तोता कहता है कोई बात नही सेठजी आप मेरा एक काम करना। सत्संग जाओ तब संत महात्मा से एक बात पूछना कि में आजाद कब होऊंगा।

सेठजी सत्संग ख़त्म होने के बाद संत से पूछते है की महाराज हमारे घर जो तोता है उसने पूछा हैं की वो आजाद कब होगा? संत को ऐसा सुनते हीं पता नही क्या होता है जो वो बेहोश होकर गिर जाते है।

सेठजी संत की हालत देख कर चुप-चाप वहाँ से निकल जाते है।

घर आते ही तोता सेठजी से पूछता है कि सेठजी संत ने क्या कहा। सेठजी कहते है की तेरे किस्मत ही खराब है जो तेरी आजादी का पूछते ही वो बेहोश हो गए। तोता कहता है कोई बात नही सेठजी में सब समझ गया।


दूसरे दिन सेठजी सत्संग में जाने लगते है तब तोता पिंजरे में जानबूझ कर बेहोश होकर गिर जाता हैं। सेठजी उसे मरा हुआ मानकर जैसे हीं उसे पिंजरे से बाहर निकालते है तो वो उड़ जाता है।

सत्संग जाते ही संत सेठजी को पूछते है की कल आप उस तोते के बारे में पूछ रहे थे ना अब वो कहाँ हैं। सेठजी कहते हैं, हाँ महाराज आज सुबह-सुबह वो जानबुझ कर बेहोश हो गया मैंने देखा की वो मर गया है इसलिये मैंने उसे जैसे ही बाहर निकाला तो वो उड़ गया।

तब संत ने सेठजी से कहा की देखो तुम इतने समय से सत्संग सुनकर भी आज तक सांसारिक मोह-माया के पिंजरे में फंसे हुए हो और उस तोते को देखो बिना सत्संग में आये मेरा एक इशारा समझ कर आजाद हो गया।

इस कहानी से तात्पर्य ये है कि हम सत्संग में तो जाते हैं ज्ञान की बाते करते हैं या सुनते भी हैं, पर हमारा मन हमेशा सांसारिक बातों में हीं उलझा रहता हैं।

सत्संग में भी हम सिर्फ उन बातों को पसंद करते है *जिसमे हमारा स्वार्थ सिद्ध होता हैं*। हमे वहां भी मान यश मिल जाये यही सोचते रहते हैं। जबकि सत्संग जाकर हमें सत्य को स्वीकार कर सभी बातों को महत्व देना चाहिये और जिस असत्य, झूठ और अहंकार को हम धारण किये हुए हैं उसे साहस के साथ मन से उतार कर सत्य को स्वीकार करना चाहिए!

सतगुरुदेव जी की जय

कृपया सभी आदरणीय भाई बहनो से विनती है आप इस पोस्ट को थोडा समय निकाल कर अवश्य पढ़िये !!!


              ।।सतगुरुदेव जी की जय→↓
                      सत साहेब

भगतो दास ये जो पोस्ट लिख रहा इसे पढ़ने से आपको इस बात पर और दृढ़ विश्वास होगा कि संत रामपाल जी महाराज स्वयं भगवान है ना कि सिर्फ 1 संत और ये पोस्ट दास गुरु जी के ज्ञान के अनुसार लिख रहा है।
अब दास अपनी पोस्ट पर आता है जी, संत रामपाल जी महाराज सत्संग में बताते है कि जब सतगुरु रूप में परमात्मा इस धरती पर आते है। तो उन्हें कोई पहचान नही पाता यहां तक की 21 ब्रह्माण्ड के मालिक काल भगवान भी उन्हें 1 आम संत ही समझते है। हम जीवो की तो ओकात ही क्या है कि परमात्मा को पहचान जाएं "गरीबदास कर्ता की बाजी भेद ना कोए पावे" अर्थात जब परमात्मा अपना खेल खेलता है अपनी बाजी चलता है तो किसी को भी नही पता चलने देता अपने बारे में परन्तु अपने कृपापात्रों के लिए इशारा भी कर देते है "खेलत गुफ़्तार सेन भंजन सब फोकट फेन" परमात्मा गुप्त रूप से अपने सब खेल खेलता है और साथ में सेन भी कर देता है अर्थात इशारा भी कर देता है कि मै परमात्मा हूँ अब दास आप भगतो को वो इशारे बताना चाहते है जिस से मुझे बहुत बार ये अनुभव हुआ की ये संत रामपाल जी परमात्मा है। गौर करने वाली बात है गुरु जी जब भी सत्संग करते है और जब वो ये दोहा बोलते है:-

गरीब, हम ही अलख अल्लाह है क़ुतुब गोश और पीर।
गरीबदास खालिक धणी हमरा नाम कबीर।।

तो परमात्मा संत रामपाल जी महाराज सेन अर्थात इशारा करते है अपने हाथ से अपनी और की मैं परमात्मा हूँ जिनपे परमात्मा दया करके समझा दे, समझा दे, वरना ये किसी के समझ में नही आती। देखो अब परमात्मा ने अपना खेल भी खेल दिया मतलब सत्संग भी सुना दिया और सेन भी करदी कि मैं परमात्मा हूँ।
परमात्मा सत्संग में कहते है

गरीब तुम साहेब तुम सन्त हो तुम सतगुरु तुम हंस।
गरीबदास तेरे रूप बिना और न दूजा अंश।।

मतलब गुरु जी कहते है कि हे कबीर साहेब आप ही सन्त हो सतगुरु हो अर्थात कबीर साहेब आप ही सतगुरु है। गुरु जी अपने मुख से बताते है कि वो परमात्मा स्वयं आते है इस धरती पर सतगुरु रूप् में। मतलब इस समय सतगुरु रूप में जो इस धरती पर वो परमात्मा है। 1 समय में धरती पे सिर्फ 1 ही सतगुरु होता है वो है संत रामपाल जी अर्थात संत रामपाल जी परमात्मा है क्योंकि सतगुरु रूप में स्वयं परमात्मा आते है इस धरती पर।
इस दास ने 1 दिन 1 भगत भाई की आत्मकथा पढ़ी उसमे उस भगत ने बताया की मुझे परमात्मा सतलोक ले गए वहां मुझे संत रामपाल जी दिखे सतलोक में, तो मैंने उनको दंडवत प्रणाम् किया तो वो बोले आप हमे क्यों दंडवत कर रहे हो हम आपके गुरु जी नही है आपके गुरु जी तो कबीर साहेब है उन्होंने मुझे तो कब का सतलोक भेज दिया मतलब इस समय धरती पर संत रामपाल जी नही खुद कबीर साहेब है और जब आरती पूरी होती है तो परमात्मा स्वयं कहते है कि

"तेरा रामपाल अज्ञान किया सतलोक का वासी"

अब आप समझ ही गए होंगे की सन्त रामपाल जी कौन है और कबीर साहेब कौन है और हमारे गुरु जी कौन है। और सतगुरु रूप में इस धरती पर इस समय कौन है और भी बहुत से प्रमाण आपको मिल जाएंगे सत्संग सुनने से कि संत रामपाल जी परमात्मा है। तो दास की सभी भगतो से प्रार्थना है कि सभी भगत ज्यादा से ज्यादा सत्संग सुने क्योंकि गुरु जी सत्संग में कहते है सत्संग से ज्ञान होता है और ज्ञान से डर बनता है और डर से भक्ति बनती है
(कबीर साधु जब लग डरके रहे
जबलग पिंड और स्वास् ।।)
भक्ति मार्ग में सफल होने के लिए सत्संग सुनना बहुत जरुरी है ।